जल संरक्षण का संदेश देता है गंगा दशहरा पर्व

Spread the love


लोहाघाट के राजस्व कर्मी भगवत प्रसाद पांडेय द्वारा कोरोना महामारी से बचाव और गंगा को स्वच्छ रखने ?
– फोटो : LOHAGHAT

ख़बर सुनें

बागेश्वर। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा मुख्य रूप से जल संरक्षण का संदेश देने वाला पर्व है। यह जीव के जीवन में जल के महत्व को परिभाषित करता है।
लोगों को नदियां, तालाब, पोखर को स्वच्छ और शुद्ध और स्वच्छ रखने की प्रेरणा और गंगा नदी के समान निरंतर कर्म पथ पर बढ़ते रहने की प्रेरणा भी देता है।
गंगा दशहरा पर्व पापनाशनी गंगा नदी के धरती पर अवतरण का वाहक है। सूर्यवंशी भगवान राम के वंशज राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लेकर आए थे। राजा सगर के पुत्रों को कपिल मुनि ने श्राप देकर भस्म कर दिया था।
जिनका उद्धार गंगा के पावन जल से हुआ था। तब से गंगा को पतितपावनी का दर्जा प्राप्त है। गंगा दशहरा पर्व पर स्नान और दान का विशेष महत्व माना गया है लेकिन मानवीय भूल और अनदेखी के चलते गंगा सहित अन्य नदियों का जल प्रदूषित होता जा रहा है।
जो आने वाले कल के लिए शुभ संकेत नहीं है। गंगा दशहरा पर्व मनुष्य को उनके कर्तव्यों की याद दिला नदियों और जल स्रोतों के संरक्षण का संदेश देता है।
तन, मन और वाणी के दोष होते हैं दूर
बागेश्वर। मनुष्य मन से तीन, शरीर से तीन और वाणी से चार प्रकार कुल 10 प्रकार के पाप करता है। गंगा दशहरा पर्व पर गंगा के पावन जल से स्नान, पूजन और जरूरतमंदों को दान देने से मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है।
गंगा दशहरा पर्व पर घरों की देहली पर मंत्रोच्चारित पत्र (गंगा दशहरा द्वार पत्र) लगाने का भी रिवाज है। शास्त्रों में गंगा दशहरा पर्व की महत्ता इस श्लोक में वर्णित है – ज्येष्ठमासे सितेपक्षे, दशमी हस्तसंयुता। हरते दस पापानि, तस्मात दशहरा स्मृता॥
गंगा शब्द निरंतर कर्मपथ पर चलते रहने का संदेश देता है। यह पर्व जल संरक्षण का भी द्योतक है। अगर हम जल की सुरक्षा नहीं करेंगे तो आने वाला कल सुरक्षित नहीं होगा। मनुष्य नदियों और जलस्रोतों की शुद्धता, स्वच्छता और संरक्षण का संकल्प लेकर ही इस पर्व की महत्ता का चरितार्थ कर सकता है।
– डॉ. गोपाल कृष्ण जोशी, आचार्य/प्रवक्ता।

बागेश्वर। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा मुख्य रूप से जल संरक्षण का संदेश देने वाला पर्व है। यह जीव के जीवन में जल के महत्व को परिभाषित करता है।

लोगों को नदियां, तालाब, पोखर को स्वच्छ और शुद्ध और स्वच्छ रखने की प्रेरणा और गंगा नदी के समान निरंतर कर्म पथ पर बढ़ते रहने की प्रेरणा भी देता है।

गंगा दशहरा पर्व पापनाशनी गंगा नदी के धरती पर अवतरण का वाहक है। सूर्यवंशी भगवान राम के वंशज राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लेकर आए थे। राजा सगर के पुत्रों को कपिल मुनि ने श्राप देकर भस्म कर दिया था।

जिनका उद्धार गंगा के पावन जल से हुआ था। तब से गंगा को पतितपावनी का दर्जा प्राप्त है। गंगा दशहरा पर्व पर स्नान और दान का विशेष महत्व माना गया है लेकिन मानवीय भूल और अनदेखी के चलते गंगा सहित अन्य नदियों का जल प्रदूषित होता जा रहा है।

जो आने वाले कल के लिए शुभ संकेत नहीं है। गंगा दशहरा पर्व मनुष्य को उनके कर्तव्यों की याद दिला नदियों और जल स्रोतों के संरक्षण का संदेश देता है।

तन, मन और वाणी के दोष होते हैं दूर

बागेश्वर। मनुष्य मन से तीन, शरीर से तीन और वाणी से चार प्रकार कुल 10 प्रकार के पाप करता है। गंगा दशहरा पर्व पर गंगा के पावन जल से स्नान, पूजन और जरूरतमंदों को दान देने से मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है।

गंगा दशहरा पर्व पर घरों की देहली पर मंत्रोच्चारित पत्र (गंगा दशहरा द्वार पत्र) लगाने का भी रिवाज है। शास्त्रों में गंगा दशहरा पर्व की महत्ता इस श्लोक में वर्णित है – ज्येष्ठमासे सितेपक्षे, दशमी हस्तसंयुता। हरते दस पापानि, तस्मात दशहरा स्मृता॥

गंगा शब्द निरंतर कर्मपथ पर चलते रहने का संदेश देता है। यह पर्व जल संरक्षण का भी द्योतक है। अगर हम जल की सुरक्षा नहीं करेंगे तो आने वाला कल सुरक्षित नहीं होगा। मनुष्य नदियों और जलस्रोतों की शुद्धता, स्वच्छता और संरक्षण का संकल्प लेकर ही इस पर्व की महत्ता का चरितार्थ कर सकता है।

– डॉ. गोपाल कृष्ण जोशी, आचार्य/प्रवक्ता।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *